ज्योलॉजी क्षेत्र में अवसरों की कमी नहीं है

क्या आप भी यह जानने के लिए आतुर रहते हैं कि पर्वतों का निर्माण कैसे होता है या ज्वालामुखी क्यों फटते हैं अथवा डायनासौर क्यों धरती से विलुप्त हो गए तो अर्थ साइंस में आप एक संतुष्टिप्रद करियर बना सकते हैं। ज्योलॉजी इसका ही एक हिस्सा है। संभावनाओं के लिहाज से देखें तो इस क्षेत्र में अवसरों की कमी नहीं है।

धरती की गहराइयों का अध्ययन जीवन के हर पहलू को प्रभावित करता है। वह अपने अंदर रहस्यों का पुलिंदा छिपाए हुए है। पृथ्वी के भीतर छिपे कुछ प्रतिशत प्राकृतिक संसाधनों से ही आम लोग परिचित हैं। जमीन के अंदर किस तरह की हलचल हो रही है, मिट्टी कैसी है और जमीन के अंदर किस तरह के बहुमूल्य खनिज पदार्थ पाए जाते हैं, इन सब तथ्यों की जानकारी हमें ज्योलॉजी के द्वारा ही मिल सकती है। 

इतिहास में
जियोफिजिक्स का पहली बार इस्तेमाल 1799 में विलियम लेंबटन ने एक सर्वे के लिए किया था, वहीं 1830 में गुरुत्व क्षेत्र का अध्ययन कर्नल जॉर्ज एवरैस्ट ने किया था। तेल के अन्वेषण के लिए पहली बार जियोफिजिक्स का प्रयोग 1923 में बर्मन ऑयल कार्पोरेशन ने किया था। इलैक्ट्रीकल सर्वे पहली बार 1933 में भारत में नीलोर और सिंघबम जिले में पीपमेयर और केलबोफ द्वारा किया गया। पहली बार किसी भारतीय, एम.बी.आर. राव ने 1937 में मैसूर में जमे सल्फाइड अयस्क के लिए इसका प्रयोग किया। जियोफिजिक्स की शिक्षा पहली बार 1949 में आंध्र और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने उपलब्ध की थी।

मुख्य विषय

अर्थ साइंस में मुख्यत: भूगोल, ज्योलॉजी और ओशियानोग्राफी जैसे विषय होते हैं। भूगोल में जहां पृथ्वी के एरियल डिफरैंसिएशन के बारे में जानकारी दी जाती है, वहीं इसके दूसरे कारक जैसे कि मौसम, उन्नयन कोण, जनसंख्या, भूमि का इस्तेमाल आदि का अध्ययन किया जाता है। ज्योलॉजी में पृथ्वी के फिजीकल इतिहास का अध्ययन किया जाता है, जैसे पृथ्वी किस तरह की चट्टानों से बनी है और इसमें लगातार किस तरह के परिवर्तन होते रहते हैं, इसका अध्ययन किया जाता है। ओशियानोग्राफी में मुख्यत: समुद्रों का अध्ययन किया जाता है।

ज्योलॉजिस्ट का कार्यक्षेत्र

ज्योलॉजिस्ट प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरण का आकलन करने के साथ पृथ्वी में छिपी खनिज सम्पदा, पुलों, सड़कों, इमारतों और रेलवे लाइन बिछाने के समय उपयुक्त जगह चिन्हित करते हैं। इतना ही नहीं भू-भौतिक व रासायनिक परीक्षण करके मिट्टी की गुणवत्ता निर्धारित करते हैं जिसके चलते भी प्राइवेट और सरकारी तेल व खनन कम्पनियों में ज्योलॉजिस्ट की मांग बढ़ी है। 

योग्यता
देश के ज्यादातर संस्थानों में ज्योलॉजी यानी भूगर्भ विज्ञान से स्नातक करने के लिए अभ्यॢथयों को फिजिक्स, कैमिस्ट्री व मैथ विषयों सहित 10+2 होना अनिवार्य है। इस विषय से स्नातक करने वाले एम.ए., एम.एससी. इन ज्योलॉजी करने के योग्य हैं। ज्योलॉजी से पीएच.डी. वही कर सकता है जिसने इस विषय में पोस्ट ग्रैजुएशन किया हो और यू.जी.सी. द्वारा निर्धारित मानक पूरे करता हो। ज्योलॉजी एवं जियोफिजिक्स से एम. टैक. भी किया जा सकता है। इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए विश्वविद्यालयों, कालेजों एवं संस्थानों के अलग-अलग मानक हैं। 

इसमें दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं जिसमें सफल अभ्यार्थियों को मैरिट के आधार पर प्रवेश दिया जाता है। 

संभावनाएं
ज्योलॉजी से स्नातक, परास्नातक एवं पीएच.डी. करने वाले अभ्यॢथयों की आजकल काफी मांग है। ज्योलॉजी के स्टूडैंट्स के लिए अनुसंधान, शिक्षण, औद्योगिक, भू-वैज्ञानिक एजैंसियों, कृषि, वन सेवा, पर्यावरण, अंतरिक्ष, समुद्रीय प्रशासन में करियर उपलब्ध हैं। वह शोधकर्ताओं, शिक्षक और लेखक के रूप में भी करियर बना सकता है। यू.पी.एस.सी. इसके लिए हर वर्ष परीक्षा लेती है।  इसके अलावा भू-विज्ञान की शिक्षा देने वाले संस्थानों में ज्योलॉजी स्कालर की नियुक्ति उसकी योग्यता के अनुसार महत्वपूर्ण पदों पर होती है। इन पाठ्यक्रमों को करने के बाद आप की नियुक्ति इकोनॉमिक, ज्योलॉजिस्ट, एटमॉस्फेयरिक साइंटिस्ट, एनवायरनमैंटल ज्योलॉजिस्ट, इंजीनियरिंग ज्योलॉजिस्ट के पदों पर हो सकती है। 

कौशल

इस क्षेत्र में जिज्ञासु व्यक्ति को ही कदम रखना चाहिए जिसे धरती के गर्भ में छिपे रहस्यों को परत दर परत खोलने की जिज्ञासा हो। कड़ी मेहनत व दृढ़ प्रतिज्ञा होना इसकी दूसरी शर्त है। एक भू-वैज्ञानिक केवल पृथ्वी के भीतर घटित हो रही घटनाओं की भविष्यवाणी ही नहीं करता है बल्कि पैट्रोलियम आपूर्ति, पानी के प्राकृतिक संसाधनों तथा मिट्टी संरक्षण के साथ कृषि उत्पादकता को बनाए रखने के लिए संकल्पित रहता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post
SANSKAR NEWS LIVE
SANSKAR NEWS LIVE

🎧 LIVE FM RADIO




🔊 Volume