माइक्रोबायोलॉजी इनोवेशन के साथ ग्रोथ

माइक्रोबायोलॉजी इनोवेशन के साथ ग्रोथ
आइंस्टीन ने कहा था, नॉलेज से पॉवरफुल व्यक्ति की इमैजिनेशन होती है। आज साइंस फील्ड में तरह-तरह के इनोवेशन हो रहे हैं। जिसकी इंसान ने कभी कल्पना नहीं की थी, वे सारी चीजें हमारे सामने घटित हो रही हैं या फिर हमारे पास मौजूद हैं। रॉकेट साइंस से लेकर नैनो टेक्नोलॉजी तक, भारतीय स्टूडेंट्स के लिए भविष्य संवारने के तमाम अवसर सामने हैं। ऐसा ही एक फील्ड है माइक्रोबायोलॉजी, जिसने कई कल्पनाओं को मूर्त रूप दिया है। इस क्षेत्र में हुए इनोवेशन (माइक्रोस्कोप) की वजह से एक माइक्रोबायोलॉजिस्ट 0.2 माइक्रॉन या उससे भी कम आकार के सूक्ष्म जीवाणु को देख सकता है, उसका अध्ययन कर सकता है। क्या है माइक्रोबायोलॉजी ?
यह बायोलॉजी की एक ब्रांच है जिसमें प्रोटोजोआ, ऐल्गी, बैक्टीरिया, वायरस जैसे सूक्ष्म जीवाणुओं (माइक्रोऑर्गेनिज्म) का अध्ययन किया जाता है। इसमें माइक्रोबायोलॉजिस्ट इन जीवाणुओं (माइक्रोब्स) के इंसानों, पौधों और जानवरों पर पड़ने वाले पॉजिटिव और निगेटिव प्रभाव को जानने की कोशिश करते हैं। बीमारियों की वजह जानने में ये मदद करते हैं। इसके अलावा जीन थेरेपी तकनीक के जरिये वे इंसानों में होने वाले सिस्टिक फिब्रियोसिस, कैंसर जैसे दूसरे जेनेटिक डिसऑर्डर्स के बारे में भी पता लगाते हैं। माइक्रोबायोलॉजिस्ट आसपास के एरिया, इंसान, जानवर या फील्ड लोकेशन से सैंपल इकज्ञ करते हैं। फिर उन पर माइक्रोब्स को ग्रो करते हैं और स्टैंडर्ड लेबोरेट्री टेक्निक से एक विशेष माइक्रोब को अलग करते हैं। मेडिकल माइक्रोबायोलॉजिस्ट खासतौर पर इस तरह की प्रक्रिया अपनाते हैं।
स्किल्स
माइक्रोबायोलॉजी में करियर बनाने के लिए कैंडिडेट के पास अपनी नॉलेज को सही जगह पर इस्तेमाल करना आना चाहिए। आज वही इस फील्ड में सक्सेसफुल है, जो आउट ऑफ बॉक्स इनोवेटिव आइडियाज पर काम करता है। जिसकी इमैजिनेशन पॉवर स्ट्रॉन्ग है। इसके अलावा जो टेक्नोलॉजी में दक्ष हो।
जरूरी क्वालिफिकेशन
भारत की कई यूनिवर्सिटीज में माइक्रोबायोलॉजी में अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट कोर्सेज उपलब्ध हैं। इसके लिए स्टूडेंट्स को फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स या बायोलॉजी के साथ 12वीं पास होना चाहिए। वहीं, पोस्टग्रेजुएशन करने के लिए माइक्रोबायोलॉजी या लाइफ साइंस में बैचलर्स डिग्री जरूरी है। इसके बाद वे अप्लायड माइक्रोबायोलॉजी, मेडिकल माइक्रोबायोलॉजी, क्लीनिकल रिसर्च, बायोइंफॉर्मेटिक्स, मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, फोरेंसिक साइंस जैसे सब्जेक्ट्स में मास्टर्स कर सकते हैं। जो लोग स्वतंत्र रूप से रिसर्च करना चाहते हैं, वे पीएचडी करने के बाद ऐसा कर सकते हैं।
करियर में संभावनाएं
आज जिस तरह से दुनिया भर में नई-नई बीमारियां सामने आ रही हैं, उसे देखते हुए कई माइक्रोब्स ( सूक्ष्म जीवाणुओं) का अब भी पता लगाया जाना बाकी है। यह काम माइक्रोबायोलॉजिस्ट बखूबी करते हैं। इसलिए उनके लिए अवसरों की कमी नहीं है। माइक्रोबायोलॉजिस्ट बैक्टीरियोलॉजिस्ट, एनवॉयर्नमेंटल माइक्रोबायोलॉजिस्ट, फूड माइक्रोबायोलॉजिस्ट, इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजिस्ट, मेडिकल माइक्रोबायोलॉजिस्ट, माइकोलॉजिस्ट, बायोकेमिस्ट, बायोटेक्नोलॉजिस्ट, सेल बायोलॉजिस्ट, इम्युनोलॉजिस्ट, वायरोलॉजिस्ट, इम्ब्रियोलॉजिस्ट आदि के रूप में करियर बना सकते हैं। इनकी गवर्नमेंट और प्राइवेट सेक्टर के हॉस्पिटल्स, लेबोरेट्रीज, फूड ऐंड बेवरेज, फार्मास्युटिकल, वॉटर प्रोसेसिंग प्लांट्स, होटल्स आदि में काफी मांग है। फार्मास्युटिकल के रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट डिपार्टमेंट में अपॉ‌र्च्युनिटीज की कमी नहीं है। अगर लेखन में रुचि है, तो साइंस राइटर के तौर पर भी अच्छा भविष्य बनाया जा सकता है। इसके साथ ही कॉलेज या यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का मौका भी है। कॉलेज में पढ़ाने के लिए मास्टर्स डिग्री के साथ सीएसआईआर-नेट क्वालिफाइड होना जरूरी है। जबकि डॉक्टरेट के बाद ऑप्शंस कई गुना बढ़ जाते हैं। विदेश की बात करें, तो नासा जैसे स्पेस ऑर्गेनाइजेशन में माइक्रोबायोलॉजिस्ट की काफी डिमांड है।
सैलरी पैकेज
माइक्रोबायोलॉजिस्ट की सैलरी उसके स्पेशलाइजेशन पर डिपेंड करती है। शुरुआत में एक फ्रेशर 15 से 20 हजार रुपये महीना आसानी से कमा सकता है। एक्सपीरियंस और एक्सपर्टाइज के साथ सैलरी बढ़ती जाती है। इसके अलावा एक माइक्रोबायोलॉजिस्ट कुछ नया इनोवेट करने पर उसका पेटेंट करा सकता है और फिर अपने प्रोडक्ट को बेचकर लाखों रुपये कमा सकता है। वह अपनी इंडिपेंडेंट लैबोरेट्री खोल सकता है।

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